नैना ने जैसे ही पुराने घर के आँगन में कदम रखा, भीगी मिट्टी की खुशबू उसके भीतर कहीं बहुत गहरे तक उतर गई।
सामने वही नीम का पेड़ था… वही टूटी दहलीज़… वही खपरैल की छत… और वही गाँव… जिसे छोड़ते वक्त उसने कसम खाई थी कि फिर कभी वापस नहीं आएगी।
लेकिन कुछ जगहें ऐसी होती हैं, जहाँ इंसान अपने पैरों से नहीं… अपने अधूरे दिल से लौटता है।
छह साल बाद वह अपने पुश्तैनी घर को बेचने आई थी।
उसने गहरी बोतल-हरी कॉटन-सिल्क साड़ी पहन रखी थी, साथ में मरून sleeveless blouse, जिसकी पीठ पर बंधी पतली डोरी हवा के साथ हल्का-सा हिल रही थी। बाल खुले थे, कंधों पर गिरते हुए। बरामदे में रखे पुराने पीतल के आईने से गुज़रते हुए उसने एक पल खुद को देखा… और उसी पल बाहर किसी की आहट हुई।
“इतने साल बाद भी… तुम वैसे ही दिखती हो।”
नैना का दिल एकदम थम-सा गया।
वह आवाज़ वह कहीं भी पहचान सकती थी।
राघव।
उसने पलटकर देखा।
सामने वही लंबा, सधा हुआ कद… हल्की दाढ़ी… सफेद कॉटन की शर्ट, मुड़ी हुई बाँहें… और आँखों में वैसी ही थमी हुई आग, जैसी उसने छह साल पहले छोड़ी थी।
नैना ने नज़रें बचाते हुए कहा,
“तुम अब भी बिना बताए सामने आ जाते हो?”
राघव हल्का-सा मुस्कुराया, पर उसकी मुस्कान में शिकायत थी।
“और तुम अब भी बिना बताए चली जाती हो।”
वातावरण में अजीब-सी चुप्पी भर गई। दूर बादल गरजे। हवा में कच्चे आम और भीगी मिट्टी की मिली-जुली गंध थी।
नैना ने बात बदलने की कोशिश की।
“मैं घर के कागज़ों के लिए आई हूँ… बस दो-तीन दिन।”
“बस?”
राघव ने उसकी तरफ थोड़ा झुककर पूछा, “या फिर हमेशा की तरह… बिना कुछ कहे सब खत्म कर देने आई हो?”
नैना कुछ नहीं बोली। उसके पास जवाब नहीं था।
सच तो यह था कि वह घर बेचने आई थी… पर डर उसे इस बात का नहीं था कि घर बिक जाएगा। डर इस बात का था कि कहीं एक बार फिर राघव को देख कर उसका दिल उसके खिलाफ न चला जाए।
रात तक बारिश शुरू हो चुकी थी।
गाँव में बिजली अक्सर मौसम के साथ रूठ जाती थी। थोड़ी देर बाद पूरा घर अँधेरे में डूब गया। नैना ने दीया जलाया और बरामदे से सूखते कपड़े समेटने बाहर चली गई। बारिश अब तेज़ हो चुकी थी। हवा इतनी भीगी थी कि उसकी साड़ी पल-पल उसके शरीर से चिपकती जा रही थी।
छज्जे से टपकती बूँदों के बीच वह बाल पीछे करती हुई खड़ी थी, तभी पीछे से एक गहरी आवाज़ आई—
“भीग जाओगी।”
वह मुड़ी।
राघव था।
हाथ में लालटेन लिए, बिल्कुल पास।
नैना ने धीमे से कहा,
“कुछ चीज़ें भीग जाने के बाद ही साफ़ दिखाई देती हैं।”
राघव ने उसे कुछ सेकंड तक बस देखा। वह नज़र साधारण नहीं थी। उसमें सवाल भी था, याद भी… और दबा हुआ मोह भी।
उसने लालटेन एक ओर रख दी। फिर बिना कुछ कहे नैना के चेहरे से गीले बाल हटाए। उँगलियाँ उसके कान के पास से होती हुई गर्दन के पास छू गईं। स्पर्श छोटा था, पर नैना की साँस लंबी हो गई।
“अब भी मुझसे नज़रें चुराती हो,” राघव ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा।
नैना ने उसे देखा।
“और तुम अब भी मुझे इस तरह देखते हो… जैसे मैं कभी गई ही नहीं।”
बारिश और तेज़ हुई।
बरामदे की पीली रोशनी में उसकी भीगी साड़ी का गहरा हरा रंग और उभर आया था। राघव की नज़र एक पल को उसके चेहरे से फिसलकर उसकी कमर तक गई… फिर वापस आँखों पर ठहर गई। उसने खुद को रोक लिया, पर चाहत छिपी नहीं।
नैना ने जाना कि यह वही क्षण है, जहाँ या तो वह फिर भाग जाएगी… या पहली बार ठहर जाएगी।
“क्यों आए हो?” उसने फुसफुसाकर पूछा।
राघव ने एक कदम और पास आकर कहा,
“यह पूछने… कि उस रात तुम गई क्यों थीं।”
नैना की पलकें झुक गईं।
“अगर बताती… तो तुम रोक लेते।”
“और अगर रोक लेता… तो क्या बुरा था?”
उसके पास कोई जवाब नहीं था।
बारिश की एक ठंडी बूँद छज्जे से टपककर नैना के कंधे पर गिरी। राघव ने अनायास उसके कंधे पर हाथ रख दिया। बस एक स्पर्श… पर ऐसा, जिसमें छह साल की दूरी एक ही पल में पिघल गई।
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नैना ने धीरे से उसकी शर्ट को छुआ।
जैसे ही उसकी उँगलियाँ राघव की छाती तक पहुँचीं, दोनों के बीच की आखिरी सावधानी भी ढह गई।
राघव ने उसकी कमर पकड़कर उसे अपने थोड़ा और करीब खींचा।
नैना का बदन ठंडी बारिश से भीगा हुआ था, लेकिन उस पल उसकी त्वचा में अजीब-सी गर्मी दौड़ रही थी। उसने आँखें बंद कीं… और अगले ही क्षण राघव के होंठ उसके इतने पास थे कि उनकी साँसें एक-दूसरे में घुलने लगीं।
पहला चुंबन धीमा था… जैसे कोई भूली हुई चीज़ सावधानी से फिर छुई जा रही हो।
फिर वही चुंबन गहरा होता चला गया।
नैना की उँगलियाँ राघव की शर्ट को थामे रहीं। राघव का एक हाथ उसकी कमर पर था, दूसरा उसकी पीठ के ऊपरी हिस्से पर, जहाँ ब्लाउज़ की डोरी के नीचे भीगी त्वचा काँप रही थी। उसने बस उसे थामा… जैसे उसे खो देना अब संभव नहीं।
जब राघव के होंठ उसके गाल से फिसलते हुए गर्दन के पास टिके, नैना की साँस टूट गई।
उसने पलकों के पीछे छिपी बरसों की कमी को पहली बार खुलकर महसूस किया।
“तुम्हें भूलना झूठ था,” नैना ने बहुत मुश्किल से कहा।
राघव ने उसके माथे से माथा टिकाकर आँखें बंद कीं।
“और तुम्हें छोड़ देना… मेरी सबसे बड़ी हार।”
नैना की आँखों में नमी थी — बारिश की नहीं।
“मैं मजबूरी में गई थी,” उसने पहली बार सच कहा, “पापा को सब पता चल गया था… उन्होंने कहा था कि अगर मैं रुकी, तो तुम्हारी ज़िंदगी खराब कर देंगे।”
राघव कुछ पल बिल्कुल चुप रहा।
फिर उसने उसकी ठुड्डी हल्के से उठाई।
“तुम चली गईं… पर मेरी ज़िंदगी कहाँ बची?”
नैना की पलकों से एक बूँद खिसक गई।
इस बार वह सच में रो पड़ी।
अगली सुबह गाँव पर धुली हुई धूप उतरी थी।
आँगन की मिट्टी से भाप उठ रही थी। नीम के पत्तों पर चमकती बूँदें टँगी थीं।
नैना को नींद नहीं आई थी।
वह उसी साड़ी में, बाल सँवारे बिना, आम के बाग की ओर निकल गई। शायद वह खुद से भागना चाहती थी, शायद राघव को ढूँढना।
वह वहीं था।
एक पेड़ के सहारे खड़ा, जैसे उसे पहले से पता हो कि नैना आएगी।
“तो?” राघव ने पूछा, “आज भी चली जाओगी?”
नैना उसके सामने आकर रुक गई।
“अगर जाऊँगी भी… तो इस बार कहकर जाऊँगी।”
राघव की आँखों में हल्की मुस्कान आई, लेकिन नैना ने उसके चेहरे से वह मुस्कान भी चुरा ली। उसने उसके कॉलर को धीरे से पकड़ा… और बिना कुछ कहे खुद उसके होंठों तक चली गई।
यह चुंबन रात वाले चुंबन से अलग था।
इसमें हिचक कम थी… स्वीकार ज़्यादा।
राघव ने उसे बाँहों में भर लिया।
नैना उसके सीने से लगी रही। हवा में कच्चे आम की खुशबू थी, और उसके दिल में अजीब-सी शांति।
“घर मत बेचो,” राघव ने उसके बालों में चेहरा छिपाते हुए कहा।
नैना ने आँखें बंद कर लीं।
“घर बेच दूँगी तो भी… जो यहाँ छूटा है, उसे कहाँ बेच पाऊँगी?”
राघव ने उसे और करीब खींच लिया।
“तो फिर यहीं रह जाओ।”
नैना चुप रही। कुछ पल बाद उसने बहुत धीमे से कहा—
“शायद इस बार… मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊँगी।”
उस शाम गाँव में फिर बारिश हुई।
लेकिन इस बार नैना बरामदे के नीचे नहीं रुकी।
वह आँगन में चली गई… खुले आसमान के नीचे।
राघव उसके पीछे आया।
बारिश की बूँदें उसके चेहरे, पलकों, होंठों पर गिर रही थीं। साड़ी फिर भीग रही थी, मरून ब्लाउज़ की भीगी डोरी उसकी पीठ से चिपक गई थी। उसने पीछे मुड़कर राघव की तरफ देखा—एक लंबी, धीमी, स्वीकार भरी नज़र से।
राघव उसके सामने आकर खड़ा हो गया।
“फिर भीगोगी?” उसने पूछा।
नैना मुस्कुराई।
“इस बार अकेली नहीं।”
अगले ही पल उसने उसका हाथ पकड़ा… और दोनों बारिश के बीच खड़े रहे, जैसे आसमान से गिरती हर बूँद उनकी अधूरी कहानी पर आखिरी मुहर लगा रही हो।
उस रात गाँव ने दो लोगों को पहली बार मिलते नहीं…
बल्कि सच में एक-दूसरे तक लौटते देखा था।
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